उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि नाबालिगों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों से जुड़े मामलों में अदालतों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि नाबालिगों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों से जुड़े मामलों में अदालतों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। उत्तराखंड हाईकोर्ट की एकल पीठ ने ऐसे मामलों में नाबालिगों की सुरक्षा और कुछ परिस्थितियों में उनकी स्वायत्तता दोनों के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया है।
न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की पीठ ने लगभग 15 वर्ष की आयु के दो नाबालिगों से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए अंतरिम आदेश के तौर पर अधीनस्थ न्यायालय में लंबित कार्यवाही पर रोक लगा दी। अदालत ने कहा कि उम्र एक महत्वपूर्ण कारक है और हर मामले की परिस्थितियों का सूक्ष्म आकलन आवश्यक है।
मामले की पृष्ठभूमि में लड़की के पिता द्वारा अपहरण का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी। पुलिस जांच के बाद आरोप पत्र दाखिल किया गया। हालांकि बचाव पक्ष ने दलील दी कि दोनों नाबालिग एक-दूसरे को कई वर्षों से जानते थे और उनके बीच संबंध आपसी सहमति से थे।
बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि लड़की के बयान में यह सामने आया कि वह आरोपी के संपर्क में थी और उनके बीच का संबंध सहमति पर आधारित था। मेडिकल रिपोर्ट में भी जबरदस्ती के संकेत नहीं पाए गए—यह तर्क अदालत के समक्ष रखा गया। साथ ही यह आशंका जताई गई कि आरोपी किशोर को निगरानी गृह में रखने से उसके भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
अदालत ने टिप्पणी की कि नाबालिगों के बीच सहमति से बने संबंधों के मामलों में लड़की का बयान अहम होता है। न्यायिक प्रक्रिया को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि संरक्षण के साथ-साथ विशिष्ट परिस्थितियों में नाबालिगों की स्वायत्तता को भी समझा जाए।
अदालत ने प्रतिवादी को नोटिस जारी करते हुए किशोर न्याय बोर्ड, देहरादून के समक्ष चल रही कार्यवाही पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है।
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