उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत एक बार फिर अपने अलग अंदाज में चर्चा में हैं।
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत एक बार फिर अपने अलग अंदाज में चर्चा में हैं। 15 दिनों के घोषित राजनीतिक अवकाश के बीच उन्होंने सोशल मीडिया पर एक अहम मुद्दा उठाते हुए गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषाओं को संविधान की 8वीं सूची में शामिल कराने की दिशा में ठोस पहल का संकेत दिया है।
अपने पोस्ट में हरीश रावत ने कहा कि गढ़वाली, कुमाऊंनी और जौनसारी जैसी क्षेत्रीय भाषाएं केवल बोलियां नहीं, बल्कि समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर हैं। उन्होंने बताया कि संसद में पहले भी इन भाषाओं को 8वीं सूची में शामिल करने को लेकर चर्चा हो चुकी है, जिसमें भोजपुरी, राजस्थानी और हरियाणवी भाषाओं के साथ इनका भी जिक्र हुआ था। उन्होंने याद दिलाया कि उस समय उन्होंने सरकार की ओर से आश्वासन दिया था कि इन भाषाओं को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए हरसंभव प्रयास किए जाएंगे।
हरीश रावत ने भाषा के विकास में साहित्य, व्यंग्य, मुहावरों और लोक कथाओं की अहम भूमिका पर जोर देते हुए एक अनोखी पहल का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि वह अपने फेसबुक पेज पर एक विशेष मंच बनाना चाहते हैं, जहां कुमाऊंनी और गढ़वाली में व्यंग्य, मुहावरे और कथानक साझा किए जाएंगे। इसके लिए उन्होंने एक विशेषज्ञ की तलाश शुरू कर दी है, जो इस पेज का संचालन करेगा। खास बात यह है कि हर महीने सर्वश्रेष्ठ मुहावरे को ₹10,000 का पुरस्कार दिया जाएगा।
पेंशन की रकम से करेंगे पुरस्कार का प्रबंध-हरीश रावत
इस पहल को लेकर हरीश रावत ने कहा कि वह अपनी एक महीने की पेंशन और आय इस कार्य के लिए समर्पित करेंगे, ताकि स्थानीय भाषाओं को प्रोत्साहन मिल सके और साहित्य सृजन को बढ़ावा मिले। गौरतलब है कि 27 मार्च को हरीश रावत ने सोशल मीडिया के जरिए 15 दिनों तक राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहने का ऐलान किया था।
उन्होंने लिखा था कि वह इस दौरान किसी राजनीतिक कार्यक्रम में हिस्सा नहीं लेंगे, हालांकि सामाजिक आयोजनों जैसे विवाह समारोह में शामिल रहेंगे। उन्होंने कहा था कि मैं अगले 15 दिनों तक राजनीतिक कार्यों से विरत रह सकूं और पीछे मुड़कर देखकर भविष्य की सोच को और बेहतर बना सकूं।
क्या है संविधान की 8वीं सूची?
संविधान की 8वीं सूची भारतीय संविधान का वह भाग है जिसमें भारत की मान्यता प्राप्त भाषाओं को शामिल किया गया है। शुरुआत में इसमें 14 भाषाएं थीं, लेकिन अब यह संख्या बढ़कर 22 हो चुकी है। इस सूची में शामिल भाषा को सरकारी स्तर पर पहचान मिलती है, साथ ही उसके विकास, साहित्य सृजन और शिक्षा में उपयोग को बढ़ावा दिया जाता है। इन भाषाओं का प्रयोग प्रतियोगी परीक्षाओं और कुछ हद तक प्रशासनिक कार्यों में भी किया जा सकता है। किसी नई भाषा को इस सूची में शामिल करने के लिए संसद में संविधान संशोधन आवश्यक होता है और इसके लिए उस भाषा का समृद्ध साहित्य, व्यापक उपयोग और सामाजिक-राजनीतिक समर्थन होना जरूरी होता है।
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